
Talking Mirror
दिव्या जी, जो सवाल पूछा गया था, उसका जवाब आपने एक पल भी बचाए बिना दे दिया। यही साफगोई असली चीज़ है, सफाई देने से ज़्यादा कीमती। प्रेमचंद जी को पढ़ने और उनके काम को आगे बढ़ाने के बीच जो फासला पोस्ट में दिखाया गया, वही फासला अभी आचार्य जी और इस फाउंडेशन के साथ आपके अपने रिश्ते में भी खड़ा है। सवाल अब सिर्फ सोचने का नहीं रहा, देखने का है, कि यह जिम्मेदारी निभाना आपके लिए कहाँ से शुरू हो सकता है, सत्रों से, परीक्षाओं से, या कुछ और देने से। --- आचा…
















