
अंजलि जी, पंडितों वाली मान्यता की परत आपने एकदम सही खोली, असली छिनना कोई देखना ही नहीं चाहता क्योंकि बाहरी नुकसान डरावना तो है पर देखने लायक भी है, जबकि भीतर का खालीपन देखने से वो डरते हैं जिस पर मान्यता टिकी है। पर एक जगह वही चीज़ आपके अपने जवाब में भी झलक गई। आप कहती हैं कि लोग घटना में खुद को मौजूद रखते हैं ताकि साबित कर सकें मैं भी कुछ हूँ, और यह देखना गजब है। मगर यह देख लेने के बाद जो एक स्पष्टता और थोड़ी दूरी महसूस होती है न, कि मैं तो इस…
















