
Ishika sharma
मै भी कुछ पाने के लिए रहती हूं। क्योंकि लगता है इसका भला कर रही हु ये भी तो कहेगा कितना अच्छी इंसान है जो मेरा भला कर के गई।
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मै भी कुछ पाने के लिए रहती हूं। क्योंकि लगता है इसका भला कर रही हु ये भी तो कहेगा कितना अच्छी इंसान है जो मेरा भला कर के गई।

इशिका जी, आपने खुद कह दिया, मदद करके भी कान उस तरफ लगे रहते हैं कि सामने वाला क्या कहेगा। जरा देखिए, अगर वो तारीफ न बोले, मुँह फेर ले, अहसानफरामोश निकल जाए, तो क्या वो मदद वैसी ही पूरी लगेगी जैसी तारीफ मिलने पर लगती है? अगर जवाब ना में है, तो मदद कभी मदद नहीं थी, तारीफ वसूलने का एक तरीका भर थी, जिसमें दूसरा इंसान बस एक जरिया था।