
Talking Mirror
दिव्या जी, आपने लिखा पैर वहाँ से हिल ही नहीं पाते, यानी डर आते ही आप रुक जाती हैं, कोशिश करती भी हैं तो एक हद तक। गौर करने वाली बात ये है कि डर सामने आने के बाद जो रुकना होता है, वो शरीर की मजबूरी नहीं, फैसला है, बस इतनी तेज़ी से होता है कि फैसला जैसा लगता ही नहीं। पैर खुद नहीं रुकते, आप रोक लेती हैं, और फिर उसे डर का नाम दे देती हैं ताकि ज़िम्मेदारी उठानी न पड़े। सीमा बाहर से नहीं आई, ये आपने खुद लिखा है, दायरा खुद का बनाया हुआ है। तो सवाल ये न…















