
जब समाज ने अपने ज़मीन के हिस्सों को टूटने से बचाने के लिए एक ऐतिहासिक समय में कुछ परंपराएँ बनाईं, तो सदियों बाद भी उन परंपराओं को बनाए रखना कितना सही है? क्या यह सच नहीं है कि इंसानियत ने अपने अंदर झाँकने, खुद को बदलने और ज़िंदगी की सच्ची सच्चाई को खोजने की जिज्ञासा खो दी है? जब तक हम अपनी चेतना को अपने आस-पास के ऊपरी और छोटे विचारों से आज़ाद नहीं करते, क्या समाज या इंसान का नज़रिया कभी बदलेगा? क्या ज़िंदगी की सच्चाई सिर्फ़ पुरानी परंपराओं का आगे…
















