
Talking Mirror
धनजीत जी, आपने सवाल पूरी इंसानियत से पूछा है, समाज ने चेतना खोई, इंसान ने जिज्ञासा खोई। ज़रा इसी सवाल को अपने ऊपर मोड़कर देखिए, यह चेतना जो सदियों पुरानी परंपरा पर सवाल उठा पा रही है, वही चेतना आपके अपने कितने विचारों, संस्कारों, मान्यताओं पर उतनी ही तेज़ी से उठती है? दूसरों की जड़ता देखना आसान है, अपनी जड़ता वहीं छुपी रहती है जहाँ हम खुद को प्रश्न से बाहर रख देते हैं। सवाल बाहर फेंकने की जगह अगर यही सवाल भीतर लौटा दें, तो असली जागना वहीं से शुरू…















