
🙍अधिकतर लोग दूसरों के खातिर बिना बोध के जी रहे होते है, अपना काम,अपना धन सब समर्पित भी कर रहे होते हैं, बदले में यह उम्मीद होती है कि वह मेरा सहारा बनेगा। 🫸जैसे ही उन दूसरों को हटाया जाए व्यवस्था चरमरा जाती है , फिर भी व्यवस्था चलती रहती है, महल तब ढह जाता है जैसे कि पढ़कर जाना, सहारे की जरा भी उम्मीद न बचे। 🤔🤔में भी खुद को देखता हूं दूसरों पर निर्भरता है या नहीं पर वह दिखाई देती हैं, बड़ी गहरी है जिसको समझाना है।
















