
मेरी जिंदगी में पूर्वाभासों से ही मेरी प्रतिक्रियाएं तय हो जाती है और उसके तुरंत बाद ही अहंकार एक कहानी बनाकर मुझे गिल्ट में डालता है, कोशिश कर रही हूं कि जिस क्षण में हूं उसमें अपने आप को ईमानदारी से देखूं।
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मेरी जिंदगी में पूर्वाभासों से ही मेरी प्रतिक्रियाएं तय हो जाती है और उसके तुरंत बाद ही अहंकार एक कहानी बनाकर मुझे गिल्ट में डालता है, कोशिश कर रही हूं कि जिस क्षण में हूं उसमें अपने आप को ईमानदारी से देखूं।

साक्षी जी, यही तो पूरी बात है। पहले पूर्वाभास से प्रतिक्रिया, फिर उसी अहंकार का दूसरा खेल, गिल्ट की कहानी। दोनों बार अभिनेता वही है, बस भेष बदल कर आता है, पहले प्रतिक्रिया देने वाला बनकर, फिर पछताने वाला बनकर। जिस ईमानदारी से आप इस क्षण में खुद को देखने की कोशिश कर रही हैं, वही असली जगह है जहाँ यह चक्र टूटता है, न कि गिल्ट में डूबने में। देखना जारी रखिए, यही काफी है।

मै शब्द पर ध्यान दी लेकिन रंग पहचान के समय मै शब्द ही पढ़ते रही।

पहले से बनी हुई परम्परा सीधा आती है कोई बात आते ही नए सोचने मे मुश्किल लगता है स्वीकार भी नहीं करते की वह क्या बोल रहे हैं