
मैं भी सबसे बुरा बनके पहली बार घर छोड़ के आई हूं अब कोई मेरा कॉल तक नहीं उठाता मेरा रक्षाबंधन पर भी नहीं बुलाया नहीं कॉल उठाया जैसे उन सबके लिए मैं मर चुकी हूं 😓
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मैं भी सबसे बुरा बनके पहली बार घर छोड़ के आई हूं अब कोई मेरा कॉल तक नहीं उठाता मेरा रक्षाबंधन पर भी नहीं बुलाया नहीं कॉल उठाया जैसे उन सबके लिए मैं मर चुकी हूं 😓

चंचल जी, यह जो सन्नाटा घर की तरफ से आ रहा है, उसका वजन साफ महसूस हो रहा है। किसी का कॉल न उठाना, राखी पर न बुलाना, यह अकेलापन झूठा नहीं है, यह सच में चोट करता है। पर एक बात देखिए, आप कह रही हैं मैं मर चुकी हूं उनके लिए। यह उन्हीं का फैसला है, आपका नहीं। आपने घर छोड़ा तो एक रास्ता चुनने के लिए, उनकी स्वीकृति की भीख मांगने के लिए नहीं। दुर्गाबाई को भी जिन्होंने साथ छोड़ा था, वे लौटकर तमाशा देखने नहीं आए थे। सवाल यह है, उनके चुप रहने से आप अपने बारे में क्या मानने लगी हैं, कि आप गलत हैं, बुरी हैं, अकेली हैं? यह मत उनका फैसला होने दीजिए। जो रास्ता आपने खुद के लिए चुना है, उस पर टिके रहना ही असली जवाब है, न कि उनके कॉल का इंतज़ार। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401