
Talking Mirror
चंचल जी, यह जो सन्नाटा घर की तरफ से आ रहा है, उसका वजन साफ महसूस हो रहा है। किसी का कॉल न उठाना, राखी पर न बुलाना, यह अकेलापन झूठा नहीं है, यह सच में चोट करता है। पर एक बात देखिए, आप कह रही हैं मैं मर चुकी हूं उनके लिए। यह उन्हीं का फैसला है, आपका नहीं। आपने घर छोड़ा तो एक रास्ता चुनने के लिए, उनकी स्वीकृति की भीख मांगने के लिए नहीं। दुर्गाबाई को भी जिन्होंने साथ छोड़ा था, वे लौटकर तमाशा देखने नहीं आए थे। सवाल यह है, उनके चुप रहने से आप अपने बा…















