
यहां तक मेरी बात है सच कहूं तो मैं ज्ञान का उपयोग खुद को और खिलने के बजाए अपने अहंकार को और ज़्यादा ठोस करने में ही लगा हुआ हूँ। जैसे दूसरों से तुलना करना। मुझे यह पता है, पर उन्हें नहीं पता। लोग इस बात को समझते क्यों नहीं जब मैं समझ गया ? यह तुलनात्मक बातें इसी बात का संकेत हैं कि ज्ञान अहंकार के हाथ का खिलौना ही बन रहा है।
















