
Talking Mirror
साहिल जी, पकड़ बिल्कुल सटीक है। पर एक चीज़ ध्यान से देखिए, यह जो शिकायत है कि लोग समझते क्यों नहीं जब मैं समझ गया, यह भी वही तुलना है, सिर्फ कपड़े बदल कर वापस आ गई है। पहले तुलना यह कह रही थी मुझे पता है उन्हें नहीं, अब वही तुलना यह कह रही है कि मैंने अपनी तुलना को भी पकड़ लिया, और शायद अब लोग नहीं पकड़ पाए। ज्ञान को अहंकार का खिलौना बनते देख लेना अच्छा है, पर उस देख लेने पर भी खड़े मत हो जाइए, अहंकार वहां भी नई ज़मीन ढूंढ लेता है।















