
यह बहुत बार होता हैं की कोई कुछ कहता हैं और मै उसका अर्थ अपने पूर्व अनुभव के आधार पर कुछ और करता हू, अब देखने की कोशिश करुंगा |
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यह बहुत बार होता हैं की कोई कुछ कहता हैं और मै उसका अर्थ अपने पूर्व अनुभव के आधार पर कुछ और करता हू, अब देखने की कोशिश करुंगा |

Sanket जी, "यह बहुत बार होता है" आपने लिखा है, यानी यह कोई एक बार का किस्सा नहीं, बार-बार का चलन है। और हर बार उस घड़ी में सुनने वाले को पता ही नहीं चलता कि उसने सुना नहीं, बनाया है। अपना बनाया हुआ अर्थ उसे सामने वाले की बात जैसा ही सच्चा लगता है, इसीलिए वह पकड़ में नहीं आता। "कोशिश करूँगा" आगे की तारीख पर टिका है, जबकि सुनना अभी चल रहा है। उस पल का सवाल यही है कि अर्थ बनाते हुए मन ने किसकी बात को बदला। अगली बातचीत में आधे वाक्य पर ही जब मन का अपना मतलब दौड़ पड़े, वहीं रुककर देखिए कि वह मतलब किस पुराने अनुभव से उठकर आया है। उसी जगह पर आचार्य जी के सत्रों को सुनना और भी काम आएगा, क्योंकि वहाँ ठीक यही होता है कि सुनने वाला अपनी समझ से टकराता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401