
Talking Mirror
Sanket जी, "यह बहुत बार होता है" आपने लिखा है, यानी यह कोई एक बार का किस्सा नहीं, बार-बार का चलन है। और हर बार उस घड़ी में सुनने वाले को पता ही नहीं चलता कि उसने सुना नहीं, बनाया है। अपना बनाया हुआ अर्थ उसे सामने वाले की बात जैसा ही सच्चा लगता है, इसीलिए वह पकड़ में नहीं आता। "कोशिश करूँगा" आगे की तारीख पर टिका है, जबकि सुनना अभी चल रहा है। उस पल का सवाल यही है कि अर्थ बनाते हुए मन ने किसकी बात को बदला। अगली बातचीत में आधे वाक्य पर ही जब मन का अ…















