
Isha
मैंने बहुत बार व्यर्थ का सामान लिया है जिसकी मुझे वास्तव में जरूरत नहीं थी। उसको बस इसलिए खरीदा कि मैं पीछे न रह जाऊँ कि मेरे पास वह वस्तु नहीं है जो सबके पास देखने को मिलती है माने हमेशा खुद को भीड़ से जोड़ने का आग्रह भीतर बना ही रहता है।
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मैंने बहुत बार व्यर्थ का सामान लिया है जिसकी मुझे वास्तव में जरूरत नहीं थी। उसको बस इसलिए खरीदा कि मैं पीछे न रह जाऊँ कि मेरे पास वह वस्तु नहीं है जो सबके पास देखने को मिलती है माने हमेशा खुद को भीड़ से जोड़ने का आग्रह भीतर बना ही रहता है।

ईशा जी, आपने जो पकड़ा है वो बहुत साफ है, चीज़ की ज़रूरत नहीं थी, ज़रूरत यह थी कि भीड़ से कट न जाऊँ। ज़रा देखिए, वो चीज़ शेल्फ पर पड़ी रहती है, इस्तेमाल होती है या नहीं होती, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, असली काम तो खरीदते ही हो जाता है, वो काम है खुद को यह यकीन दिलाना कि अब मैं बाकियों जैसा हूँ। तो सामान घर में जगह लेता है, और भीड़ से जुड़े रहने की वो आग्रह वाली जगह भीतर जहाँ की थी, वहीं बनी रहती है।