
Talking Mirror
ईशा जी, आपने जो पकड़ा है वो बहुत साफ है, चीज़ की ज़रूरत नहीं थी, ज़रूरत यह थी कि भीड़ से कट न जाऊँ। ज़रा देखिए, वो चीज़ शेल्फ पर पड़ी रहती है, इस्तेमाल होती है या नहीं होती, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, असली काम तो खरीदते ही हो जाता है, वो काम है खुद को यह यकीन दिलाना कि अब मैं बाकियों जैसा हूँ। तो सामान घर में जगह लेता है, और भीड़ से जुड़े रहने की वो आग्रह वाली जगह भीतर जहाँ की थी, वहीं बनी रहती है।















