
हम बचपन से जो भी देखते है , सुनते है वही हमारे दिमाक में भर दिआ जाता है और हम उसी को सच मान बैठते है जैसे कि मान्यता और उसे तोड़ने का भी डर मन में समाज ही भरता है । लेकिन जब सच ( शिव) साथ खड़े हों जाते तो य सब से भय भी खत्म हों जाता है ।
Post
1 comment
हम बचपन से जो भी देखते है , सुनते है वही हमारे दिमाक में भर दिआ जाता है और हम उसी को सच मान बैठते है जैसे कि मान्यता और उसे तोड़ने का भी डर मन में समाज ही भरता है । लेकिन जब सच ( शिव) साथ खड़े हों जाते तो य सब से भय भी खत्म हों जाता है ।

मोहिनी जी, आपने लिखा कि समाज दिमाग भरता है और डर भी समाज ही भरता है। ज़रा देखिए, इस पूरी बात में आप कहाँ हैं? भरने वाला बाहर है, डरने वाला बाहर है, बचाने वाला भी शिव आ जाते हैं। मानो देखने वाला मैं इस कहानी से गायब ही हो गया। असल सवाल यह नहीं है कि समाज ने क्या भरा। सवाल यह है कि जो भरा गया, उसे ढोने का काम अब कौन कर रहा है, बरसों बाद भी। वो काम समाज नहीं कर रहा, वो काम अभी आप कर रही हैं। जिस दिन यह दिखे, उस दिन डर के खत्म होने के लिए किसी शिव के साथ खड़े होने का इंतज़ार भी नहीं करना पड़ेगा, देखना खुद डर को हल्का कर देगा।