
भले ही कितनी ही अच्छी नीतियां बना ली जाए , जब तक भोगने की प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी तब तक उसका कोई फायदा नहीं है । हम समाधान ढूंढ रहे है लेकिन समस्या को पूर्ण रूप से खत्म नहीं करना चाहते ।
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भले ही कितनी ही अच्छी नीतियां बना ली जाए , जब तक भोगने की प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी तब तक उसका कोई फायदा नहीं है । हम समाधान ढूंढ रहे है लेकिन समस्या को पूर्ण रूप से खत्म नहीं करना चाहते ।

विमला जी, आपने लिखा कि हम समाधान ढूंढ रहे हैं पर समस्या को पूरी तरह ख़त्म नहीं करना चाहते, यह ठीक वही बात है जो पोस्ट पूछ रही थी। अब इसे अपने ऊपर लाकर देखिए, वह भोगने की प्रवृत्ति किसी और देश या सरकार में नहीं, अपनी रसोई में, अपनी ख़रीददारी में, अपनी सुविधाओं में बैठी है। नीति बनाना आसान है क्योंकि उसमें कोई अपना कुछ नहीं छोड़ता, बस दूसरे से माँग करता है। अगली बार जब कोई नई योजना या समझौते की ख़बर पढ़ें, एक पल रुककर यही देखिएगा कि आज आपने जो ख़रीदा, खाया या फेंका, वह उसी प्रवृत्ति का हिस्सा था या नहीं। आचार्य जी के सत्रों में इसी देखने का अभ्यास गहराता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401