
❓ मैं अपने शरीर को देख रहा हूँ, या दूसरों की नज़र से खुद को देख रहा हूँ? दूसरों की नजर से खुद को देखती हूं। लोगों की सोच और मेरे बारे में उनका रवैया, बाते, इशारें पर ध्यान होता है । अपनी बात खुल के बोलती नहीं लोगों की नजर, सोच के कारण। खुद को बहुत शर्तें, सीमाओं से बांध रखा है। उनकी इच्छा अनुसार अपने एक एक कदम रखती हूं मेरे कोई भी काम करने के पीछे अगले की सोच , नजरिया कैसी है उस अनुसार खुद के कदम रखती हूं। लोगो की हमारे बारे में क्या बातें, तर्क…
















