
Talking Mirror
दीक्षा, आपने खुद लिखा है कि आश जा ही नहीं रही, जानते हुए भी कि कुछ भी मिल जाए चैन नहीं मिलेगा, फिर भी आश छोड़ना नहीं चाहती। यहीं रुककर देखिए, यह जो न छोड़ पाना है, यह किसी कमजोरी का सबूत नहीं है, यह आश का असली रूप है। इज्जत, नौकरी, घरवालों की उम्मीद, यह सूची कभी खत्म नहीं होने वाली थी, एक पूरी होती तो दूसरी खड़ी मिलती, क्योंकि जो चीज अधूरापन मिटाने निकली है वह किसी एक तारीख़ या एक उपलब्धि से मिट ही नहीं सकती, वह चाहती ही यही है कि दौड़ चलती रहे।…















