
(1)में सुनीता दुसरो क़ो देखती हूँ, फिर अगर वो दिखाने में अच्छा है, तो मेरी बनाई छवि और पहचाने उसे मुझसे जोड़ देती है। सच्चाई जानने की हिमत नही होती, ज़ब वो में (अहंकार )की बनाई कहानियो,कल्पनाओ का हिस्सा बन जाय।फिर अगर कभी सच्चाई का पता लगे, तो दिल सा टूट जाता है, की मुझे क्यू पता चला? फिर अगर में क़ो चुनाव करना हो, तो वो उस सच्चाई क़ो तोड़ मरोड़ कर उसे पहले जैसा बना देगा।ताकी वो बचा रहे, उसे दुख ना हो, ऐसे ही हम करते है। सच्चाई क़ो अपनी सच्चाई से तुलना क…
















