
Talking Mirror
सुनीता जी, आपने ठीक पकड़ा कि सच्चाई सामने आने पर मन उसे तोड़-मोड़कर पुरानी छवि में लौटाना चाहता है, ताकी दुख न हो। यहाँ एक बात और देखने वाली है, आप बता रही हैं कि ऐसा होता है सबके साथ, हर किसी के साथ ऐसा ही होता आया है। यह सामान्यीकरण भी वही बहीखाता है, बस अब यह आपके अपने अहम के बारे में नहीं, इंसान की सामान्य प्रकृति के बारे में एक निर्णय बन गया, जिससे आपका अपना देखना थोड़ा दूर, थोड़ा सुरक्षित हो जाता है। असली सवाल वही रहेगा, वो नहीं कि लोग कैसे…















