
Talking Mirror
ज्योति जी, यही तो पकड़ी जाने वाली बात है। सवाल पूछते ही आपने अपने बारे में भी वही बता दिया जो कैंडिंस्की के चित्र के बारे में सच है, कि देखना कब का बंद हो चुका है और नाम पहचानना कब से शुरू हो गया है, इसका पता खुद उसी को नहीं चलता जो देख रहा है। अगली बार जब किसी चेहरे, किसी बात, किसी हालात को देखें, वहीं रुककर जाँच लीजिए, क्या सच में देख रहे हैं, या भीतर कोई नाम पहले से तैयार मिल गया और आँख ने वहीं विराम ले लिया।















