
मैं चीज़ो से नहीं बल्के लोगों से जुड़ जाती हूं,, इतना के लोग जब खुद मुझ से दूर होते थे मैं टूट जाती थी लगा था मैं बची ही नहीं, अब मैं हू ही नहीं , जब से आचार्य जी से जुड़ी हूं, तो कमी आई है काफी बल्के काफी ज़्यादा, लेकिन अभी भी बहुत बचा है पूरी तरह से यह नहीं छूटा but पहले जैसा नहीं रहा जो बच है वो भी चला जाएगा.

















