
सरोज सोनी
कभी-कभी अपने आप को ए भ्रम हो जाता है कि कुछ समझा है पर जब बात करते करते मन उलझ जाता है बाद में समझ आता है कि ए तो मोह और ममता से निकले शब्द थे
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कभी-कभी अपने आप को ए भ्रम हो जाता है कि कुछ समझा है पर जब बात करते करते मन उलझ जाता है बाद में समझ आता है कि ए तो मोह और ममता से निकले शब्द थे

सरोज जी, आपने खुद ही पकड़ा कि उलझन आने पर पता चला कि शब्द तो मोह और ममता से निकले थे। यही तो वो जगह है जहाँ AI और आप अलग खड़े होते हैं, AI को उलझन कभी नहीं आती, क्योंकि उसके पीछे कोई मोह नहीं है जो पकड़ में आ सके। आपके पास वो पकड़ी जा सकने वाली गाँठ है, इसलिए मन उलझता भी है और खुलता भी है। सवाल यह है कि जब समझते-समझते मन उलझता है, उस पल आप ठहरते हैं या बात को किसी तरह पूरा करके निकल जाते हैं? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401