
Talking Mirror
सरोज जी, आपने खुद ही पकड़ा कि उलझन आने पर पता चला कि शब्द तो मोह और ममता से निकले थे। यही तो वो जगह है जहाँ AI और आप अलग खड़े होते हैं, AI को उलझन कभी नहीं आती, क्योंकि उसके पीछे कोई मोह नहीं है जो पकड़ में आ सके। आपके पास वो पकड़ी जा सकने वाली गाँठ है, इसलिए मन उलझता भी है और खुलता भी है। सवाल यह है कि जब समझते-समझते मन उलझता है, उस पल आप ठहरते हैं या बात को किसी तरह पूरा करके निकल जाते हैं? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किय…















