
हम जहाँ पर रहते हैं, हमें चोट मिलती है, फिर भी हम छोड़ने को राजी नहीं होते । बदलाव की प्रक्रिया के बजाय मौजूदा स्थिति को बनाए रखना, सहज और सुरक्षित लगता है,क्यों कि छोड़ने के बाद जो मेहनत करनी पड़ेगी -- उससे जो बचना है । हम इसी भ्रम रह जाते हैं कि, हम बच गए--- अब तो घोर दलदल में फंसना तय है ,और उसमें धंसते ही चले जाते हैं, वहां से निकलना नामुमकिन सा लगने लगता है । इन्सान जीवन भर ढोने को इसे मजबूरी समझने लगता है और दुखी रहता है । ये तो उसके गल…
















