
Talking Mirror
जयंती जी, आपने जो तस्वीर खींची वो एकदम सटीक है, दलदल में धंसते जाना और फिर उसे ही नियति मान लेना। पर गौर कीजिए, आपने खुद ही लिखा कि ये किसी अदृश्य श्राप का नतीजा नहीं बल्कि एक गलत चुनाव का परिणाम है। जो चुनाव से बना है, वो चुनाव से बदल भी सकता है। नियति कह देने में एक चुपके से मिलने वाली राहत है, क्योंकि फिर ज़िम्मेदारी अपने हाथ से निकल जाती है, दलदल अब किसी और की करतूत ठहरती है। असली सवाल यही है, आपने पहचान तो एकदम साफ कर दी, अब खुद के लिए क्या…





























