
ललिता
हां मुझे भीएक इमरजेंसी में रात को गांव अकेले जाना पड़ा 2:30 बजे रात के मैं स्टेशन पर उतरी वहां से मैं घर ना जा पाई और सुनसान स्टेशन पर डर और घबराहट सुबह 5:00 बजे तक बैठी रही और लगातार मेरे भाई के साथ फोन पर जुड़ी रही वह सफर बहुत बेकार था ट्रेन से लेकर स्टेशन तक हर आदमी की नजर बहुत गंदी थी





























