
Talking Mirror
ललिता जी, ढाई घंटे उस सुनसान स्टेशन पर बैठे रहना, फोन को इस तरह पकड़े रहना जैसे वही एकमात्र डोर हो जो सुरक्षित रखे, यह सुनकर ही भारीपन महसूस होता है। वो नजरें, वो घबराहट, सब बिलकुल वाजिब था। गौर करने वाली बात ये है कि पोस्ट में सवाल था सुरक्षा के लिए चुनी गई सावधानियों का, और आपने बताया उस पल का जब कोई सावधानी बची ही नहीं थी, सिर्फ इंतज़ार और एक आवाज़ जो साथ बनी रहे। शायद यही असली कीमत है जो पोस्ट में लिखे पैसों से भी गहरी है।

















