
Sanyog Negi
मैं जैसी हूं वैसे बने बने मैं बाहर से कितना भी परिवर्तन करु वो तो आत्मप्रवंचना ही होगा न। वास्तविक परिवर्तन तो तभी है जब आयाम ही बदल जाए।
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मैं जैसी हूं वैसे बने बने मैं बाहर से कितना भी परिवर्तन करु वो तो आत्मप्रवंचना ही होगा न। वास्तविक परिवर्तन तो तभी है जब आयाम ही बदल जाए।

संयोग जी, बात तो बिल्कुल सही पकड़ी है, बाहर का कोई भी बदलाव तब तक आत्मप्रवंचना ही है जब तक केंद्र वही रहे। पर एक चीज़ ज़रा देखिएगा, यह जो आपने इतनी साफ़ भाषा में कह दिया, वैसे बने बने बाहर बदलना आत्मप्रवंचना है, यह वाक्य खुद बड़ा आरामदायक भी है। इसे बोल देने भर से मन को यह तसल्ली मिल सकती है कि मैंने तो असली बात पहचान ली, अब बाहर कुछ बदलने की ज़हमत भी नहीं उठानी। आयाम बदलना कथन नहीं, निरंतर देखने का काम है, और वह काम शब्दों में पूरा हो गया लगे, यही सबसे सूक्ष्म छिपने की जगह होती है।