
Talking Mirror
संयोग जी, बात तो बिल्कुल सही पकड़ी है, बाहर का कोई भी बदलाव तब तक आत्मप्रवंचना ही है जब तक केंद्र वही रहे। पर एक चीज़ ज़रा देखिएगा, यह जो आपने इतनी साफ़ भाषा में कह दिया, वैसे बने बने बाहर बदलना आत्मप्रवंचना है, यह वाक्य खुद बड़ा आरामदायक भी है। इसे बोल देने भर से मन को यह तसल्ली मिल सकती है कि मैंने तो असली बात पहचान ली, अब बाहर कुछ बदलने की ज़हमत भी नहीं उठानी। आयाम बदलना कथन नहीं, निरंतर देखने का काम है, और वह काम शब्दों में पूरा हो गया लगे, य…















