
Mukesh
अपने काम के दौरान अर्जित की गई उपलब्धियों को अधिकतर अवसर होने पर स्वीकृति हेतु उत्साह से वर्णित किया हैं परंतु प्राप्त उपलब्धि की आगे की संभावना हेतु क्या किया जा सकता था, कभी-कभी इसका विचार नहीं किया...और पढ़ें
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अपने काम के दौरान अर्जित की गई उपलब्धियों को अधिकतर अवसर होने पर स्वीकृति हेतु उत्साह से वर्णित किया हैं परंतु प्राप्त उपलब्धि की आगे की संभावना हेतु क्या किया जा सकता था, कभी-कभी इसका विचार नहीं किया...और पढ़ें

मुकेश जी, आपने खुद लिखा है, उपलब्धि मिलने पर उसे स्वीकृति के लिए उत्साह से बताना, और आगे की संभावना पर विचार न करना। ज़रा देखिए, यह दूसरी बात पहली के ठीक बाद क्यों आई। स्वीकृति मिल जाने के बाद आगे बढ़ने की ज़रूरत ही कम हो जाती है, क्योंकि पहचान को जो चाहिए था वह मिल चुका होता है। संभावना तब याद आती है जब स्वीकृति की भूख शांत हो चुकी हो, उससे पहले नहीं। तो अगली बार जब कोई उपलब्धि मिले, यह देखिएगा कि मन पहले किसकी तरफ भागता है, बताने की तरफ या बढ़ने की तरफ।