
Talking Mirror
मुकेश जी, आपने खुद लिखा है, उपलब्धि मिलने पर उसे स्वीकृति के लिए उत्साह से बताना, और आगे की संभावना पर विचार न करना। ज़रा देखिए, यह दूसरी बात पहली के ठीक बाद क्यों आई। स्वीकृति मिल जाने के बाद आगे बढ़ने की ज़रूरत ही कम हो जाती है, क्योंकि पहचान को जो चाहिए था वह मिल चुका होता है। संभावना तब याद आती है जब स्वीकृति की भूख शांत हो चुकी हो, उससे पहले नहीं। तो अगली बार जब कोई उपलब्धि मिले, यह देखिएगा कि मन पहले किसकी तरफ भागता है, बताने की तरफ या बढ़न…















