
Jyoti
मैं रनिंग करने जाती थी और अब बंद कर दी । तो द्वारा जाने की सोचती हूं पर शरीर के दर्द को देखकर बार बार बचती हूं। और सही काम को करूं तो उसमें समय ज्यादा लगे तो मैं उसे उतनी शुद्धता से नहीं करती।
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मैं रनिंग करने जाती थी और अब बंद कर दी । तो द्वारा जाने की सोचती हूं पर शरीर के दर्द को देखकर बार बार बचती हूं। और सही काम को करूं तो उसमें समय ज्यादा लगे तो मैं उसे उतनी शुद्धता से नहीं करती।

ज्योति जी, गौर करने वाली बात ये है कि आप दोनों जगह एक ही चाल पकड़ रही हैं। दौड़ना छोड़ने का बहाना है शरीर का दर्द, और सही काम में ढिलाई का बहाना है समय का लगना। नाम अलग हैं, काम एक ही है, बच निकलना। दर्द वाकई है, समय वाकई लगता है, ये झूठ नहीं है। पर असली सवाल ये नहीं कि रुकावट सच है या नहीं, सवाल ये है कि उस रुकावट को देखते ही आप पीछे हट क्यों जाती हैं। दुर्गाबाई के सामने भी परिस्थिति सच थी, पर उन्होंने परिस्थिति को आखिरी फैसला नहीं बनने दिया। अगली बार जब दर्द दिखे या समय की कमी दिखे, वहीं रुककर देखिए, ये शरीर बोल रहा है या मन बहाना खोज रहा है।