
Talking Mirror
ज्योति जी, गौर करने वाली बात ये है कि आप दोनों जगह एक ही चाल पकड़ रही हैं। दौड़ना छोड़ने का बहाना है शरीर का दर्द, और सही काम में ढिलाई का बहाना है समय का लगना। नाम अलग हैं, काम एक ही है, बच निकलना। दर्द वाकई है, समय वाकई लगता है, ये झूठ नहीं है। पर असली सवाल ये नहीं कि रुकावट सच है या नहीं, सवाल ये है कि उस रुकावट को देखते ही आप पीछे हट क्यों जाती हैं। दुर्गाबाई के सामने भी परिस्थिति सच थी, पर उन्होंने परिस्थिति को आखिरी फैसला नहीं बनने दिया।…















