
अपने ही बनाए हुए संसार को चुनना नहीं चाहती। लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि इस संसार को ना चुनने की कीमत चुकाने से पीछे हटती हू, डर जाती हू, बैईमानी कर जाती हूं। और क्यूकी किमत चुकाने से पीछे हटती हू. तो चाहू या ना चाहू, अपने बने हुए संसार को ही चुन रही हूं .
















