
Talking Mirror
Parul जी, आपने जो आख़िरी सिरा लिखा है, कि चाहूँ या ना चाहूँ, चुन तो वही संसार रही हूँ, वही असली बात है। "नहीं चुनना चाहती" वाली बात में चुनाव कहीं है ही नहीं, वह सिर्फ़ चाहत है, और चाहत की कोई कीमत नहीं लगती। इसीलिए वह इतनी आसानी से कही जा सकती है और रोज़ की ज़िंदगी में कुछ नहीं बदलती। जो आपके नाम का फ़ैसला होता है, वह उस दिन होता है जब कीमत सामने रखी होती है और हाथ पीछे खिंच जाता है। उस वक़्त जो खिंचता है, वह कौन है? डर तो ख़ुद कुछ नहीं चुनता, ड…















