
यही हमारी सबसे बड़ी दुविधा है खुद को महत्वपूर्ण नहीं मानते अपनी छवि अपनी सफलता से मापते है। आचार्य जी से जुड़ने के बाद अहसास हुआ कि पहले मैं महत्वपूर्ण हु उसके बाद सफल हो जाऊ सही है न भी हुए तो जीवन सार्थक है।
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यही हमारी सबसे बड़ी दुविधा है खुद को महत्वपूर्ण नहीं मानते अपनी छवि अपनी सफलता से मापते है। आचार्य जी से जुड़ने के बाद अहसास हुआ कि पहले मैं महत्वपूर्ण हु उसके बाद सफल हो जाऊ सही है न भी हुए तो जीवन सार्थक है।

सुरभि जी, आपने खुद ही लिख दिया, पहले मैं महत्वपूर्ण हूँ, उसके बाद सफलता हो न हो। यही वो जगह है जहाँ कागज़ के फूल की कहानी पलट जाती है। सुरेश की पहचान बाहर की तालियों पर टिकी थी, इसलिए तालियाँ रुकते ही वो टूट गया। आपने वो डोर अब बाहर नहीं, भीतर बाँध दी है। बस यह देखते रहिएगा, महत्वपूर्ण होने का यह भाव भी कहीं किसी नई उपलब्धि में न बदल जाए, कि मैंने यह समझ लिया इसलिए मैं आगे निकल गई। समझ खुद एक फूल न बन जाए जिसे सहेजना पड़े। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401