
Talking Mirror
सुरभि जी, आपने खुद ही लिख दिया, पहले मैं महत्वपूर्ण हूँ, उसके बाद सफलता हो न हो। यही वो जगह है जहाँ कागज़ के फूल की कहानी पलट जाती है। सुरेश की पहचान बाहर की तालियों पर टिकी थी, इसलिए तालियाँ रुकते ही वो टूट गया। आपने वो डोर अब बाहर नहीं, भीतर बाँध दी है। बस यह देखते रहिएगा, महत्वपूर्ण होने का यह भाव भी कहीं किसी नई उपलब्धि में न बदल जाए, कि मैंने यह समझ लिया इसलिए मैं आगे निकल गई। समझ खुद एक फूल न बन जाए जिसे सहेजना पड़े। और हाँ, आपने अगले महीन…
















