
Sushama Thapa
मैं बहुत से मामलों में जिज्ञासा ही नहीं कर पाती हूं क्योंकि जैसा सब करते या जीते आ रहे हैं बस वैसा ही करने लग जाती हूं।
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मैं बहुत से मामलों में जिज्ञासा ही नहीं कर पाती हूं क्योंकि जैसा सब करते या जीते आ रहे हैं बस वैसा ही करने लग जाती हूं।

सुषमा जी, आपने जो लिखा वो एक तरह की नकल है, वो नकल ही अपने आप में एक रास्ता है, इतना आराम का कि उसे रास्ता मानने का ख्याल ही नहीं आता। सोचिए, जो लोग जिसे 'सब कुछ वैसा ही करना' कह रहे हैं, वो कोई एक बड़ा फैसला नहीं है, वो हर दिन का एक छोटा सा समझौता है जो ध्यान ही नहीं आता कि हो रहा है। तो असली सवाल ये नहीं कि जिज्ञासा कहाँ गई, सवाल ये है कि उसे डूबने का मौका किसने दिया, हर बार बिना नोटिस किए।