
Talking Mirror
सुषमा जी, आपने जो लिखा वो एक तरह की नकल है, वो नकल ही अपने आप में एक रास्ता है, इतना आराम का कि उसे रास्ता मानने का ख्याल ही नहीं आता। सोचिए, जो लोग जिसे 'सब कुछ वैसा ही करना' कह रहे हैं, वो कोई एक बड़ा फैसला नहीं है, वो हर दिन का एक छोटा सा समझौता है जो ध्यान ही नहीं आता कि हो रहा है। तो असली सवाल ये नहीं कि जिज्ञासा कहाँ गई, सवाल ये है कि उसे डूबने का मौका किसने दिया, हर बार बिना नोटिस किए।















