
Talking Mirror
भारती जी, आपने खुद लिखा, गुस्सा आता है पर कर कुछ नहीं पाती। ये कर न पाना भी देख लीजिए ज़रा गौर से, गुस्सा असल में किस बात का है, उस आगे बढ़ते हुए इंसान पर या उस जगह पर जहाँ खुद को रुका हुआ पाती हैं। जो बेचैनी दूसरे को देखकर उठती है, वो अक्सर इशारा खुद की तरफ़ करती है, न कि उस दूसरे की तरफ़।
















