
Meera Sharma
कुछ दिन टिकता ही और फिर पीछे हट जाता हूं, सही काम समझता हूं पर लेकिन सुविधा से समझौता नहीं कर पाता हूं। यही अंहकार की सबसे बड़ी चाल होती है।
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कुछ दिन टिकता ही और फिर पीछे हट जाता हूं, सही काम समझता हूं पर लेकिन सुविधा से समझौता नहीं कर पाता हूं। यही अंहकार की सबसे बड़ी चाल होती है।

मीरा जी, यह पकड़ना ही असली बात है, कि यह चाल है, कोई कमज़ोरी नहीं। ध्यान दें, जब आप कहती हैं यही अहंकार की सबसे बड़ी चाल होती है, तो बहीखाता वहीं एक और एंट्री बना लेता है, समझ लेने की एंट्री, और समझ को ही उपलब्धि मान लेता है। समझना और टिकना दो अलग चीज़ें हैं। अगली बार जब सुविधा सामने खड़ी हो, यह मत पूछिए कि मैं समझता हूं या नहीं, पूछिए कि आज मैं टिका या नहीं।