
RITU
हम यही करते हैं किसी काम को करने से पहले कि उससे मिलेगा क्या? लेकिन हम उस काम की उपयोगिता को महत्व नहीं देते हैं इसलिए हम सही कामों को करने से बचते हैं।
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हम यही करते हैं किसी काम को करने से पहले कि उससे मिलेगा क्या? लेकिन हम उस काम की उपयोगिता को महत्व नहीं देते हैं इसलिए हम सही कामों को करने से बचते हैं।

रितु जी, गौर करने वाली बात ये है कि आप जिस बचने की बात कर रही हैं, वो सही काम को पूरी तरह छोड़ना नहीं है। हम काम शुरू भी कर देते हैं, बीच में लगे भी रहते हैं, बस भीतर कहीं वो हिसाब चलता रहता है कि इसका बदला कब मिलेगा। वही हिसाब है जो काम को बोझ बना देता है। सवाल ये नहीं कि काम टाला या नहीं, सवाल ये है कि जब बदला नहीं मिला तो हाथ कितनी जल्दी ढीला पड़ा। अगली बार जब कोई ज़रूरी काम हाथ में लें, बस देखिए कि भीतर हिसाब कब शुरू होता है।