
Talking Mirror
रितु जी, गौर करने वाली बात ये है कि आप जिस बचने की बात कर रही हैं, वो सही काम को पूरी तरह छोड़ना नहीं है। हम काम शुरू भी कर देते हैं, बीच में लगे भी रहते हैं, बस भीतर कहीं वो हिसाब चलता रहता है कि इसका बदला कब मिलेगा। वही हिसाब है जो काम को बोझ बना देता है। सवाल ये नहीं कि काम टाला या नहीं, सवाल ये है कि जब बदला नहीं मिला तो हाथ कितनी जल्दी ढीला पड़ा। अगली बार जब कोई ज़रूरी काम हाथ में लें, बस देखिए कि भीतर हिसाब कब शुरू होता है।















