
यह सवाल जब भी मेरे सामने आता है कि मैं बोध साहित्य को कितने लोगों तक पहुंच पाई या कितने लोगों की जिंदगी बेहतर कर पाई। मैं असमंजस में पड़ जाती हूं क्योंकि जितना मैं देख पा रही हूं बुक स्टॉल पर भी खड़ी होती हूं। तो उनमें से जिज्ञासु हकीकत में बहुत कम है, लेकिन फिर यह समझ में आता है कि आचार्य जी ने भी इसी तरह हर एक व्यक्ति से बात की, लाखों लोगों से बात करने के बाद शायद कुछ जिज्ञासु मिले होंगे। मैं बच्चों के हमेशा ज्यादा संपर्क में रही हूं तो उनक…
















