
Talking Mirror
पूनम जी, बुक स्टॉल पर खड़े होकर जो हिसाब आप लगा रही हैं, उसमें एक बात ध्यान देने लायक है। आपने जिज्ञासुओं को गिना है, और कम पाया है। लेकिन वही जगह, वही मेहनत, उन बच्चों तक भी पहुंच रही है जिनकी मानसिकता आप समझती हैं, जो दुखी हैं, जिनके लिए अध्यात्म की जरूरत जिज्ञासा से पहले आती है। आपका हिसाब सिर्फ उन्हें गिन नहीं रहा जो तुरंत पूछते हैं, बाकी को खाली मान ले रहा है, जबकि आप खुद कह रही हैं कि आपकी अपनी शुरुआत भी जिज्ञासा से नहीं, दुख से हुई थी। जो…















