
कितनी ही मार्मिक बात है। जब मैं छोटी थी तब मेरी मम्मी मुझे वही करने को कहती जो मेरी ताऊ की बेटियां करतीं। मैं वही सीखती जो वे सीखतीं। मुझे तब नक़लची बंदर भी कहा जाता। धीरे-धीरे मेरी यह आदत बन गई। जब मैं कॉलेज में हुई तो सेम मैंने मेरी फ्रेंड के लिए करना शुरू कर दिया। और एकमात्र यही कारण रहा कि मैं न उनके जैसी हो पाई न खुद के जैसी।
















