
आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं भी सामाजिक व पारिवारिक दबाव में रहती हैं उन पर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी भी है और सुनने को भी मिलता है कि नौकरी करने का चुनाव तो तुमने ही किया था अपनी चेतना के उपयोग की स्वतंत्रता अभी भी दूर की कौड़ी है
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आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं भी सामाजिक व पारिवारिक दबाव में रहती हैं उन पर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी भी है और सुनने को भी मिलता है कि नौकरी करने का चुनाव तो तुमने ही किया था अपनी चेतना के उपयोग की स्वतंत्रता अभी भी दूर की कौड़ी है

किरण जी, आपने जो नब्ज़ पकड़ी है वो सटीक है, आर्थिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो घर के भीतर वही पुराना हिसाब चलता रहता है, दोहरी ज़िम्मेदारी और ऊपर से ताना कि चुनाव तो तुमने ही किया था। यही वो जगह है जहाँ नौकरी का पैसा तो हाथ में आ जाता है, पर निर्णय लेने की, अपनी शर्तों पर जीने की स्वतंत्रता अब भी दूसरों की मंज़ूरी पर टिकी रह जाती है। सवाल यही खड़ा होता है, तनख्वाह मिलना और अपनी चेतना का मालिक होना, ये दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं तो असली आज़ादी किसमें है।

असली आज़ादी है अपने पैरों पर खड़े होना और साथ ही अपनी चेतना का मालिक होना। अध्यात्म ही समाधान है।